Wednesday, January 29, 2014

मां-बाप कि ग़ुर्बत पे यूँ पड़ता रहा पर्दा
भाई कि कमीज़ों को बड़े शौक़ से पहना

 जिसने कभी उतरन नहीं पहनी हो क्या जाने
खद्दर  का लबादा मुझे क्योंकर नहीं चुभता

कल मेरा था, अब उसका है कल होगा किसी का
मैं उसका था मैं उसका हूँ मैं उसका रहूँगा

जिसने मुझे आज़ाद किया क़ैद-ए-बदन से
मैं उसको दुआएं नहीं देता तो क्या करता

4 comments:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 30-01-2014 को चर्चा मंच पर दिया गया है
    आभार

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    1. Hausla badhaane ke liye shukriya Dilbagh ji.

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  2. काफी उम्दा रचना....बधाई...
    नयी रचना
    "सफर"
    आभार

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